गोंदिया: इतिहास
भंडारा जिल्हा का विभाजन होके १ मई १९९९ को गोंदिया जिल्हा का निर्माण हुवा.
राज्य के अंतिम छोर पर बसे गोंदिया शहर का अपना इतिहास है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगड कि सीमा पर बसे इस शहर का अपना अंदाज था। गोंदिया परिसर पर पेहले गोंड राजा का राज्य था। तब यहाँ जंगल घना हुआ करता था।
गोंड समाज के लोग यहाँ के पुराने रहिवासी है। उनका काम गोन्ध और लाख जमा कर उसे गाव में बेचना था।
उसी वजह से गोंदिया नाम पडा।
उसी वजह से गोंदिया नाम पडा ऐसा इंग्रज के जमाने के आर.व्ही. रसेल इन्होने ‘गॅझेटियर’ में लिखा है।
उस समय आज के जैसे राज्य और सीमाये नहीं थे, पर कूच अंतर पर बदलणे वाली भाषा थी।
उसी वजह से गोंदिया से लगे राज्य कि भाषा का असर गोंदिया कि भाषा पर पडा। गोंदिया का संबंध छत्तीसगड व मध्य प्रदेश से बडते गये और आज भी यह संबंध गेहराई के साथ जुडे हुये है। उस वक़्त गोंदिया सी.पी.ॲँड बेरार का भाग हुं करता था।
भोसले के साम्राज्य में कामठा, फुलचूर और किर्नापूर कि जमीनदारी हुं करती थी, प्रसाश्कीय दृष्टीकोन से अंग्रेजो ने गोंदिया को तालुका का दर्जा दिया।
उस वक्त आदिवासी लोग लाख, डिंक, सागवान, मोहफुल, आवळा, चिंच आदी गोंदिया में बेचने लाते थे।
उस वक्त गोंदिया में लाख के ३२ कारखाने थे।
इधर पुराना गोंदिया, मुर्री और फुलचूर में लोग बसने लगे और नये उद्योग का आगाज होता गया, समय के साथ साथ लाख कारखाने बंद होते गये।
1877 में जब स्वामी विवेकानन्द बैलगाड़ी से नागपुर से रायपुर जा रहे थे तो दर्रेकासा की गुफा के पास उन्हें पहली भाव समाधी हुई.(book "Journey of Swami Vivekananda to Raipur and His First Trance")