Heimatgeschichte · Palani ·

पलनी: इतिहास

पलनी: इतिहास

=== प्रथा व परंपरा ===
पुरातन तमिल भक्ति लेखों में इस नगर का उल्लेख आता है। एक स्थानीय कथानक के अनुसार बेहुन नाम का एक मुखिया (பேகன்-கடை ஏழு வள்ளல்களில் ஒருவர்) था, एक बार वन में जाते हुए उसने ठंड से ठिठुरता एक मोर देखा. उसे मरने के लिए छोड़ने की बजाय उस मुखिया ने अपने ऊपर का वस्त्र उसे पहना दिया व स्वयं ठंड झेलता रहा। यह कथानक सत्य है या नहीं इसका कोई प्रमाण नहीं है, परन्तु इससे कुछ मनोरंजक बातें साफ होती हैं; जैसे कि उस इलाके की जनसंख्या कम से कम इतनी तो थी ही कि उनका एक मुखिया हो, मोर उस इलाके में बहुत संख्या में थे तथा लोग उनकी अर्चना करते थे। वे मोर को भगवान सुब्रमन्यन का प्रिय पंछी मानते थे, ठीक ऐसे ही जैसे आज लोग मानते हैं। साथ ही यह भी साफ होता है कि मौसम ठंडा होता था, जिस वजह से गरम वस्त्र प्रचलित थे, हालांकि ऐसा मौसम अब केवल पहाड़ों पर ही होता है।

इस युग में पलनी व अधिकतर डिंडीगुल जिला तमिल क्षेत्र के कोंग नाडु प्रदेश का हिस्सा था। ओट्टानचत्रम तालुका व पलनी के उत्तरी भाग अण्ड नाडु उपक्षेत्र का भाग थे, जबकि बाकी हिस्से वैय्यापुरी नाडू का भाग थे।[उद्धरण चाहिए]

ऐसा प्रतीत होता है कि यह भूभाग मदुरई व कोयंबटूर शासकों के प्रभाव में रहा। इसका प्रमाण है शहर में सुशोभित भगवती पेरीयानयाकि अम्मान का भव्य मंदिर. दो मछलियों वाला षड्यंत्र राजाओं का चिन्ह इस मंदिर में कई जगहों पर विद्यमान है जिससे यह ज्ञात होता है कि प्रथम शताब्दी में यह भूभाग मदुरई के पंड्यन राजाओं के प्रभाव क्षेत्र में था। मंदिर के आँगन में बना मंडपम (मंडप) हालांकि मदुरई के नायक शासकों के वास्तुशास्त्र पर आधारित है। नायक शासकों को विजयनगर नरेश ने 14वीं व 15वीं शताब्दी में वनवरयर की उपाधि देकर इस शहर का दायित्व सौंपा था। अतः यह मान लेना उचित प्रतीत होता है कि नगर पर नायक शासकों का लंबा वर्चस्व रहा। यह बात इस क्षेत्र में प्रचलित है कि शहर के नायक राजा लगभग स्वाधीन थे, तथा स्वाभिमानी थे। उन्होंने कभी पंड्या या कोयंबटूर नरेश की दासता स्वीकार नहीं की। इससे इस मान्यता को भी बल मिलता है कि पंड्या नरेश के कुछ रजवाड़े ऐसे भी थे जो आसानी से दासता स्वीकार करने की बजाय स्वाधीन कहलाना पसंद करते थे, जबकि कुछ अन्य प्रबल रूप से विभिन्न युद्धों में नरेश के सहभागी बनते थे। पंड्या राज्य के युद्ध-आलेखों में इस आशय का विस्तृत वर्णन मिलता है।

अगले समय काल पर हमें ज्ञान हैदर अली व टीपू सुल्तान पर लिखे आलेखों से मिलता है। तीसरे एंग्लों-मैसूर युद्ध के बाद जब डिंडीगुल का समर्पण हुआ तो इन दोनों योद्धाओं को ब्रिटश सेना ने पकड़ कर युद्धबंदी बना लिया। यहाँ से यह भी ज्ञात होता है कि उस समय पलनी बालासमुद्रमं के पॉलिंगर अथवा पलयकरर (शब्दार्थः नगर चालक) नेताओं के अधीन था,[उद्धरण चाहिए] नगर के (ईंट के) किले के एवज में यह पलयकरर कोयम्बटूर स्थित सुल्तान के प्रशासक व प्रतिनिधि को मामूली कर चुकाते थे।[उद्धरण चाहिए] आज भी बालसमुद्रम में नायकर जाति (मदुरई के नायक राजाओं की जाति) के बहुत लोग रहते हैं। वे अपना उद्गम स्थान आज के आंध्रप्रदेश को मानते हैं, तथा आज भी थोड़ी बहुत तेलुगु बोल लेते हैं। इससे यह आभास होता है कि इनके पूर्वजों को मदुरई नरेश ने पलनी किले का दायित्व सौंपा था, तथा मदुरई,[उद्धरण चाहिए] नरेश के पतन के बाद भी इनका वर्चस्व किले पर कायम रहा।

एक अन्य मनोरंजक बात पलनी में सौराष्ट्र मार्ग का होना. तमिल साहित्य में 'सौराष्ट्र' शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है जो तंजावूर अथवा मदुरई के सरफोजी राजाओं का प्रभुत्व हो गया था। यह वक्त नायक राजाओं के पतन व 18वीं सदी में हैदर अली के उद्गम में बीच का समय था। …

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Quelle: Text: Wikipedia – „पलनी“, Autorinnen und Autoren (Versionsgeschichte), CC BY-SA 4.0 · Foto: Jandeva, CC BY-SA 4.0 – Wikimedia Commons