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श्रीरंगपट्टण: इतिहास

श्रीरंगपट्टण: इतिहास

श्रीरंगपट्टण प्राचीन काल से एक नगरीय केन्द्र और तीर्थ स्थल है। विजयनगर साम्राज्य में यह राजप्रतिनिधित्व का के मुख्य केन्द्र बन चुका था, यहाँ से आसपास के रजवाड़ों जैसे कि मैसूर और तालकाड़ पर नज़र रखी जाती थी। जब विजयनगर साम्राज्य के पतन को भाँप लिया गया, तब मैसूर के रजवाड़ों ने स्वाधीनता की ओर क़दम बढ़ाया और श्रीरंगपट्टण को अपना पहला नशाना बनाया। वाडियार राजा ने रंगराया को परास्त किया, जो श्रीरंगपट्टण में 1610 तक प्रतिनिधि-शासक थे। इसके बाद राजा ने नगर में नवरात्रि पर्व को शहर में धूम-धाम से मनाया। उस समय यह मान्यता प्रचलित थी कि दो बातों से नियंत्र प्रदर्शित होता है और मैसूर राज्य के तख्त के किसी भी दावेदार की स्वाधीनता का इशारा मिलता है:

10-दिन तक फैले नवरात्रि पर्व का सफल आयोजन, जो चामुण्डेश्वरी देवी को समर्पित था जो मैसूर की रक्षक मानी जाती थी;
श्रीरंगपट्टण दुर्ग का नियंत्रण, राजधानी मैसूर के सबसे निकट किले की घेराबंदी।
श्रीरंगपट्टण मैसूर राज्य का भाग 1610 से लेकर 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद तक रहा; चूँकि दुर्ग राजधानी मैसूर से निकटतम दूरी पर थी, इसलिए उसे किसी भी प्रहार की स्थिति में बचाव के अंतिम गढ़ के रूप में देखा गया है।

हैदर अली और टीपू सुलतान के नेतृत्व में श्रीरंगपट्टण मैसूर की वस्तुतः राजधानी बन गया।
जब टीपू ने अंततः विधि द्वारा स्थापित वाडियार महाराज से सत्ता अपने हाथ में ली और उन्हें अपना बंदी बनाते हुए अपनी "खुदादाद सलतनत" की घोषणा की, श्रीरंगपट्टण वास्तुत: इस अल्प-अवधि अस्तित्व की राजधानी बना। इस तूफ़ानी दौर में टीपू के राज्य की सीमाएँ हर दिशा में फैलने लगी थी, जिसमें दक्षिण भारत का एक बड़ा भाग सम्मिलित हो गया था। श्रीरंगपट्टण के मज़बूत राज्य की संयुक्त राजधानी के तौर पर विकसित हुआ। विभिन्न भारतीय-इस्लामी स्मार्क इस नगर में फैले हैं, जैसे कि टीपू के महलम "दरिया दौलत" और "जुमा मस्जिद", जो इस दौर से सम्बंधित हैं।

श्रीरंगपट्टण टीपू सुलतान और 50,000 लोगों के गठजोड़ वाली हैदराबाद के निज़ाम और ब्रिटिश सेनाओं के बीच युद्ध जनरल जॉर्ज हैरिस के नेतृत्व में लड़ा गया। यह चतुर्थ ऐंगलो-मैसूर युद्ध की अंतिम कड़ी थी। श्रीरंगपट्टण की लड़ाई 1799 में वास्तव में एक निर्णायक युद्ध थी और इसके ऐतिहासिक प्रभाव देखे गए।
बहरहाल टीपू सुलतान को श्रीरंगपट्टण दुर्ग में ही अपनी विश्वासपात्र के धोके के कारण मौत का शिकार होना पड़ा; वह जगह जहाँ वह वीर गति को प्राप्त किए थे, एक स्मारक बन चुका है। इतिहास में अंतिम बार श्रीरंगपट्टण मैसूर सलतनत के राजनीतिक सत्ता पलट का केन्द्र बना। विजयी सेना की संयुक्त सेना ने सेरिंगापट्टनम को बर्बाद करने और टीपू के महल को लूटने के लिए आगे बढ़ी। आम सोने और नक़द के अलावा कई बहुमूल्य कलाकृतियाँ जिनमें कुछ टीपू की ओर विशेष रूप से निर्मित थे, उसके क़ीमती कपड़े और जूते, तलवार और बारूद इंगलैंड भेजे गए।
हालाँकि इन में से अधिकाँश को ब्रिटिश राजशाही संग्रह में और विकटोरिया और ऐलबर्ट संग्रहालय में पाया जा सकता है, इन में कुछ वस्तुओं को समय-समय नीलाम भी किया गया है और अपने मूल निवासीय स्थान वापस पहुँचाया जाता गया है। टीपू सुलतान की तलवार को एक नीलाम में विजय माल्या प्राप्त किया था, जो व्यापार जगत में कर्नाटक के शराब के सौदागर रूप में प्रसिद्ध हैं। युद्ध भूमि का अधिकांश हिस्सा ज्यों का त्यों है, जिसमें किले, पानी के द्वार, वह स्थान जहाँ टीपू का शरीर पाया गया, वह जगह जहाँ ब्रिटिश क़ैदियों को रखा जाता था और तबाह किया गया महल। टीपू का शेर जैसाकि स्वचालित रूप में वह चलता था विकटोरिया और ऐलबर्ट संग्रहालय में इस युद्ध के पश्चात रखा गया।

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Quelle: Text: Wikipedia – „श्रीरंगपट्टण“, Autorinnen und Autoren (Versionsgeschichte), CC BY-SA 4.0 · Foto: Jean-Pierre Dalbéra from Paris, France, CC BY 2.0 – Wikimedia Commons