Heimatgeschichte · Chabua ·

चबुआ: इतिहास

चबुआ: इतिहास

१८२० के दशक के मध्य में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने यंडाबू संधि के माध्यम से अहोम राजाओं से इस वृहत क्षेत्र (वर्तमान तिनसुकिया तथा डिब्रूगढ़) का अधिग्रहण किया. इस अधिग्रहण करने का उनका मुख्य मकसद था इलाके में मौजूद प्राकृतिक संपदा का दोहन करना. कच्चे तेल, कोयले और वन्य उत्पाद के अलावा उन्हें यहाँ चाय खेती की भी बड़ी संभावनाएँ नज़र आईं थीं. १८३० के दशक से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने असम में चाय के बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया। असम में सिंग्फो जनजाति द्वारा पारंपरिक रूप से विकसित चाय के एक किस्म की खेती की जाने लगी।
इसी कड़ी में चबुआ का नाम १८२३ में पहली बार आया जब अंग्रेजों ने यहाँ चाय का बागान लगाने की सोची. १८२३ में बहुत से गरीब भारतीय मजदूरों को एक अज्ञात जगह में काम करने के लिए बलपूर्वक ले जाया गया. इन गरीब मजदूरों को पता नहीं था की किस पौधे की बुआई या रोपण के लिए उन्हें लाया गया है. जो पौधे उन्हें रोपण के लिए दिए गए उनकी उन्हें पहचान नहीं थी. वे चाय के पौधे को जंगली पौधा समझ रहे थे और अंग्रेजों द्वारा इस पौधे को महत्व देने को उनका पागलपन समझ रहे थे. इन मजदूरों ने इस पौधे का नाम "चा" दिया. "बुआ" मतलब बोना. इन्ही दो शब्दों यानी चा और बुआ को मिला कर इस स्थान का नाम चबुआ पड़ा, ऐसा माना जाता है. १८४० तक चबुआ के बड़े भूभाग में चाय की खेती की जाने लगी. १८४० में ही असम टी कंपनी की स्थापना हुई और इस क्षेत्र में चाय का वाणिज्यिक उत्पादन शुरू हुआ। सदी के अंत तक, असम दुनिया में अग्रणी चाय उत्पादक क्षेत्र बन गया। असम में चाय उत्पादन के इतिहास में चबुआ का नाम हमेशा रहेगा.
चबुआ के निकट कुछ स्थान ऐतिहासिक दृष्टिकोण के कारण उल्लेखनीय है-

ऊपरी असम में चबुआ में एयर फोर्स बेस है जिसे “ईस्टर्न बेस्टीयन” यानी ‘पूर्वी गढ़' कहा जाता है। चबुआ के समीपवर्ती ४ किमी की दूरी पर स्थित यह हवाई क्षेत्र वास्तव में दूसरे विश्व युद्ध में मित्र देशों की सेना के एयरबेस के रूप में तैयार किया गया था। १९३९ में निर्मित, हवाई क्षेत्र को बड़े पैमाने पर जापान के खिलाफ कार्रवाई करने और सामान और युद्ध सामग्री आपूर्ति के लिए इस्तेमाल किया गया था और युद्ध के बाद इसे छोड़ दिया गया था।
१९६२ में, तिब्बत में चीनी आक्रमण और उत्तर-पूर्व को हड़पने की चीनी रणनीति के मद्देनज़र भारतीय वायु सेना ने इस एयरफील्ड को फिर से शुरू किया। प्रारंभ में डकोटा और वैम्पयार, बाद में हंटर, औटर्स और एमआई-चार हेलीकाप्टरों से चबुआ एयर बेस का एयर आपरेशन शुरू किया गया। मध्य सत्तर के दशक में, रनवे उन्नयन और नवीकरण के बाद सुपरसोनिक मिग-21 मुख्य लड़ाकू विमान के रूप यहाँ से संचालित हो रहा है. अक्टूबर, १९६६ में पूर्ण रूप से स्थापित इस इकाई का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। सात वीर चक्र, एक वायु सेना मेडल और पांच “मेंशन-इन-डिस्पैचिज” मिलना इस इकाई की वीरता का प्रमाण है। हाल ही में इस इकाई को चालू वर्ष के लिए पूर्वी वायु कमान के `सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू स्क्वाड्रन 'के रूप में घोषित किया गया है।

चबुआ से ५ किमी उत्तर की दूरी पर प्रसिद्ध दिनजॉय सत्र स्थित है। गोपाल आठदेऊ के बारह मुख्य भक्तों के बीच, उनके अनन्य भक्त अनिरुद्ध देव ने उत्तर लखीमपुर के बिष्णुबलिकाकुंशी गांव में एक सत्र की स्थापना की। बाद में इस सत्र को खुटीपुटिया में स्थानांतरित कर दिया गया था। इस अवधि के दौरान मोमरिया विद्रोह हुआ और यह सत्र गहरी मुसीबत में घिर गई। फिर अनेकों दिक्कतों और अस्थिरता के बाद यह सत्र मटक सम्राट और अहोम सम्राट के सहमति से तिनसुकिया के रंगागडा में स्थापित हुआ फिर १८३७ में आखिरी बार इससे स्थानांतरित किया गया और इससे वर्तमान के दिनजॉय नामक जगह पर स्थापित किया गया.

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Quelle: Text: Wikipedia – „चबुआ“, Autorinnen und Autoren (Versionsgeschichte), CC BY-SA 4.0 · Foto: Earth Science and Remote Sensing Unit, Lyndon B. Johnson Space Center, Public domain – Wikimedia Commons