फारबिसगंज: इतिहास
फारबिसगंज का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में जब अलैक्जेंडर जॉन फोरबेस ने बाबू प्रताप सिंह दुगड़ व अन्य से सुल्तानपुर इस्टेट की खरीद की तो इसे फोरबेसाबाद नाम दिया गया। सन 1877 में हंटर की रिपोर्ट में भी शहर का नाम फोरबेसाबाद ही दर्ज है। लेकिन जब रेलवे लाइन आई तो शहर का नाम बदल कर फोरबेसगंज कर दिया। इस शहर के अंदर रामुपर, किरकिचिया, भागकोहलिया तथा मटियारी राजस्व ग्राम हैं और सुल्तानपुर इस्टेट की कचहरी के अवशेष आज भी नजर आते हैं। अलैक्जेंडर ने ही यहां सबसे पहले नील की खेती शुरू की और इस्टेट के अधीन 17 हजार बीघे में नील उपजाया जाता था। प्रथम विश्व युद्ध के दिनों में नील की चमक फीकी पड़ने से पहले ही अलैक्जेंडर व उसके वारिस जमींदारी व जूट के धंधे में पांव रख चुके थे। नील धीरे धीरे घटता गया और फारबिसगंज की चर्चा अनाज, कपड़ा व अन्य उपभोक्ता सामानों की सबसे बड़ी मंडी के रूप मे होने लगी। फारबिसगंज का बाजार चारो दिशाओं से रोजाना आने वाली हजारों अनाज लदी गाड़ियों की वजह से समृद्धि के शिखर को छूने लगा। फोरबेस परिवार के बाद इस्टेट का कारोबार ई रौल मैके के अधीन आ गया। मैके आम जन के साथ घुलमिल कर रहने वाला अंग्रेज था और स्थानीय बोलियां बड़े आराम से बोल लेता था । सन 1945 में उन्होंने इस्टेट को जेके जमींदारी कंपनी के हाथ बेच दिया और सबके सब वापस इंग्लैंड चले गए। मैके कानून का बड़ा ज्ञाता था और 1929 में उसने इंडिगो सीड से जुड़े एक मामले में दरभंगा के महाराजा सर कामेश्वर सिंह को हरा दिया था । यहां मैला आंचल उपन्यास के लेखक श्री फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म स्थल भी हैं।