ओरछा: इतिहास
इसका इतिहास 15वीं शताब्दी से शुरू होता है, जब इसकी स्थापना रुद्र प्रताप सिंह जूदेव बुन्देला ने की थी जो सिकन्दर लोदी से भी लड़े थे चूंकि जबतक बुंदेला रजवाड़ों का अधिपत्य इस भूमि पर रहा तबतक कोई अन्य शासक इस भूमि को गुलाम नहीं बना पाया फिर वह चाहे मुगल हों या अंग्रेज या मराठा इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि यह भारतीय सामरिक दृष्टि से भी बड़ा महत्वपूर्ण इलाका था चूंकि अगर किसी भी सेना या उत्तरी राजा को अगर युद्ध में दक्षिणी शासकों को युद्ध लड़ना पड़ता था तो बुंदेलखंड से ही होकर गुजरना पड़ता था और यही दक्षिण के शासकों के साथ भी था, जगह की पहली और सबसे रोचक कहानी एक मंदिर की है। दरअसल, यह मंदिर भगवान राम की मूर्ति के लिए बनवाया गया था, लेकिन मूर्ति स्थापना के वक्त यह अपने स्थान से हिली नहीं। ओरछा के राजा मधुकर शाह कृष्ण भक्त थे उनकी धर्म पत्नी रानी गणेश कुंअर राम भक्त थी किसी बात को लेकर राजा एवं रानी में विवाद हुआ और गुस्से में राजा ने अपनी रानी से कहा अगर इतनी ही बड़ी राम भक्त हो तो राम को ओरछा ले आओ रानी भी भी क्रोध में आकर महल त्याग श्री राम की तपस्या में सरयू किनारे चली गई तपस्या के समय आत्मबलिदान के लिए सरयू नदी में छलाग़ लगा दी उसी वक्त श्री राम ने रामस्वरूप में रानी को अपना विग्रह प्रदान किया जो जिसको मधुकर शाह बुन्देला के राज्यकाल (1554-92) के दौरान उनकी रानी गनेश कुवर राजे अयोध्या से लाई थीं। रानी गनेश कुंवर राजे वर्तमान ग्वालियर जिले के करहिया गांव की परमार राजपूत थीं। चतुर्भुज मंदिर बनने से पहले रानी पुख्य नक्षत्र में अयोध्या से पैदल चल कर बाल स्वरूप भगवान राम(राम लला)को ओरछा लाईं परंतु रात्रि हो जाने के कारण भगवान राम को कुछ समय के लिए महल के भोजन कक्ष में स्थापित किया गया। लेकिन मंदिर बनने के बाद कोई भी मूर्ति को उसके स्थान से हिला नहीं पाया। इसे ईश्वर का चमत्कार मानते हुए महल को ही मंदिर का रूप दे दिया गया और इसका नाम रखा गया राम राजा मंदिर। आज इस महल के चारों ओर शहर बसा है और राम नवमी पर यहां हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं। वैसे, भगवान राम को यहां भगवान मानने के साथ यहां का राजा भी माना जाता है, क्योंकि उस मूर्ति का चेहरा मंदिर की ओर न होकर महल की ओर है।आज भी भगवान राम को राजा के रूप में(राम राजा सरकार) ओरछा के इस मंदिर में पूजा जाता है और उन्हें गार्डों की सलामी देते हैं।मंदिर में चमड़े से बनी वस्तुओं का प्रवेश निषिद्ध हैं।
आज भी इस राजवंश की कुछ शाखाएं आस पास के जिलों में निवासरत है जैसे टीकमगढ़ चंदेरी बानपुर कंजिया (पिपरासर) एवं अन्य निकटतम बुंदेलखंड के इलाके में अपनी संस्कृति एवं विरासत को संजोए हुए ।
1857-58 में झांसी और ओरछा के बीच महायुद्ध हुआ था. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और रानी लडई सरकार के बीच युद्ध हुआ था.