माण्डू: इतिहास
पुर्व तालकपुर (धार जिले में ही) राज्य से मिले एक शिलालेख के अनुसार, एक व्यापारी चंद्रसिंह ने "मंडपा दुर्गा" में स्थित पार्सवनाथ मंदिर में एक मूर्ति स्थापित की। "माण्डू" शब्द मंडपा दुर्गा का ही समय के साथ बदला हुआ नाम है। ६१२ विक्रम संवत के एक शिलालेख इंगित करती है कि 6वीं सदी में मांडू एक समृद्ध शहर हुआ करता था।
10वीं और 11वीं शताब्दी में माण्डू को परमारों के शासनकाल् में प्रसिद्धि प्राप्त हुई। 633 मीटर (2079 फीट) की ऊंचाई पर स्थित मांडू शहर, विंध्य पर्वत में 13 किमी (8.1 मील) पर फैला हुआ है। उत्तर में मालवा का पठार और दक्षिण में नर्मदा नदी की घाटी, परमारों के इस किला-राजधानी को प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करता थी। जयवर्मन द्वितीय से शुरू होने वाले परमार राजाओं के अभिलेखों में माण्डू ("मंडपा-दुर्गा" के रूप में) को शाही निवास के रूप में उल्लेख किया गया है। यह संभव है कि जयवर्मन या उसके पुर्वज जैतूगि ने पड़ोसी राज्यों के लगातार हमलों के कारण, पारंपरिक परमार राजधानी धार से माण्डू स्थानांतरित कर दिया होगा। गयासुद्दीन बलबन, दिल्ली के सुल्तान नसीर-उद-दीन के जनरल, इस समय परमार क्षेत्र के उत्तरी सीमा तक पहुंच गए थे। इसी समय, परमारों को देवगिरि के यादव राजा कृष्ण और गुजरात के वघेला राजा विशालदेव से हमलों का सामना करना पड़ा। धार, जो मैदानी इलाकों में स्थित है, की तुलना में माण्डू के पहाड़ी क्षेत्र में स्थिति एक बेहतर रक्षात्मक अवस्थिति प्रदान करती होगी।
इन्दौर से लगभग ९0 किमी दूर है। माण्डू विन्ध्य की पहाडियों में 2000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह मूलत: मालवा के परमार राजाओं की राजधानी रहा था। तेरहवीं शती में मालवा के सुलतानों ने इसका नाम शादियाबाद यानि "खुशियों का शहर" रख दिया था। वास्तव में यह नाम इस जगह को सार्थक करता है। यहाँ के दर्शनीय स्थलों में जहाज महल, हिन्डोला महल, शाही हमाम और आकर्षक नक्काशीदार गुम्बद वास्तुकला के उत्कृष्टतम रूप हैं।ख़िलजी शासकों द्वारा बनाए गए इस नगर में जहाज और हिंडोला महल खास हैं। यहाँ के महलों की स्थापत्य कला देखने लायक है। मांडू इंदौर से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग से यह धार से भी जुड़ा हुआ है।