अचलपुर: इतिहास
मध्यकाल में विशेषत: 9वीं शती से 12वीं शती ई. तक अचलपुर जैन संस्कृति के केन्द्र के रूप में विख्यात था। जैन विद्वान धनपाल ने अचलपुर में ही अपना ग्रन्थ 'धम्म परिक्खा' समाप्त किया था। आचार्य हेमचंद्रसूरि ने भी अपने व्याकरण में अचलपुर का उल्लेख किया है- 'अचलपुरेचकारलकारयोर्व्यत्ययो भवति' अर्थात् अचलपुर के निवासियों के उच्चारण में च और ल का व्यत्यय (उलटफेर) हो जाता है। आचार्य जयसिंहसूरि ने 9वीं शती ई. में अपनी धर्मोपदेशमाला में अयलपुर या अचलपुर के अरिकेसरी नामक जैन नरेश का उल्लेख किया है- 'अयलपुरे दिगंबर भत्तो अरिकेसरी राजा'। अचलपुर से 7वीं शती ई. का एक ताभ्रपट्ट भी प्राप्त हुआ है।
बैतूल गजेटियर के अनुसार इस किले को राजा इल - एल ने बनाया था जिसकी राजधानी एलिजपुर वर्तमान अचलपुर महाराष्टï्र थी। राजा ईल ने ही अजंता एलोरा की गुफाओं को बनाया था जो बाद में राजा ईल - एल के नाम पर एलोरा कहलाई गई। खेरला पर राज करने वाले एक अन्य राजा जैतपाल का जिक्र पढऩे को मिलता है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसके पास पारस पत्थर था जिसका उपयोग वह लोहे को सोना बनाने में करता था। इस राजा के कार्यकाल में टैक्स लगान न चुकाने वाले किसानो के लोहे से बने सभी उपयोगी सामान जैसे गैची, सब्बल, कुल्हाड़ी, फावड़ा तक कुर्क कर लेता था जिसे वह बाद में पारस पत्थर से सोना बना कर अपने खजाने में रखता था। अपार सोना होने के चक्कर में ही लोगो ने इस किले को आज खण्डहर का रूप दे दिया.
राजा के पास पारस पत्थर होने का खामियाजा उसे कई बार भोगना पड़ा क्योकि हर कोई प्रतिद्घंदी शासक उस किले पर चढ़ाई सिर्फ पारस पत्थर को पाने के लिए ही करता था। मराठी के एक मात्र प्राचीन गं्रथ विवेक सिंधु में खेरला राजवंश की कई कहानियो को इस ग्रंथ के रचयिता मुकुंदराज स्वामी ने लिखा है। एक जनश्रुति के अनुसार बार -बार आक्रमण और लड़ाई - मारकाट से परेशान होकर अंत समय में राजा जैतपाल ने मुगलो के पास वह अनमोल पारस पत्थर न चला जाये इस डर से पारस पत्थर को बचाने के लिए उसे इस किले से ठीक सामने उसके द्घारा बनवाये गये रावणवाड़ी के तालाब में फेक दिया था। मुगलो के बाद जब अग्रेजी शासन आया और उसे भी इस किले के राजा द्घारा रावणवाड़ी के तालाब में पारस पत्थर होने की बात पता चली तो वे भी उसे पाने के लिए भरसक प्रयास किये जिसमें अंग्रेजो द्घारा रावणवाड़ी के तालाब के चारों ओर हाथियो के पांव में लोहे की साकल - चैन को बांध कर उसे तालाब के चारों ओर घुमाने तथा उसमें कि एक मात्र लोहे की चैन - साकल के सोने बन जाने की भी जनश्रुति सुनने को मिलती है।
मिश्रित गौंड एवं राजपूत राजाओं के इस किले के एक अन्य राजा एल - ईल से मुगल सेनापति रहमान शाह दुल्हा के बीच की लड़ाई को लेकर भी कई कहानियाँ सुनने को एवं पढऩे को मिलती है। विवेक सिन्धु के अनुसार मुगल सेनापति का और जैतपाल का युद्घ हुआ था लेकिन एलिजपुर वर्तमान अचलपुर में रहमान शाह दुल्हा के धड़ की मजार के पास बनी राजा इल की मजार इस कहानी को झुठलाती है। उसके अनुसार रहमान शाह दुल्हा और राजा इल का युद्घ हुआ था। मगल सेनापति मारा गया लेकिन राजा इल के मरने की कहानी कुछ अलग ही सुनने को मिलती है। बरहाल किसी जमाने में खेरला शक्तिशाली राज्य रहा होगा जिसमें निमाड़ के अलावा 35 परगने उसके अधीन थे। 13 वी एवं 14 वी तथा15 वी सदी के दौर में खेरला राजवंश का इतिहास काफी रोमांचकारी एवं दिल को दहला देने वाली शौर्यगाथाओं से भरा हुआ है। आज सरकारी उपेक्षा एवं देखरेख के अभाव में खेरला का किला महज एक प्राचीन भारत की पहचान बन कर रह गया है।
यूं तो भारत के कई राजा-महाराजाओं के किले उनके द्वारा जमा किये गये प्रचुर खजानों से भरे पड़े हैं . …