Heimatgeschichte · Mahabaleshwar ·

महाबलेश्वर: इतिहास

महाबलेश्वर: इतिहास

प्राचीनकाल में कृष्णा नदी और इसकी चार मुख्य सहायक धाराओं के उद्गम स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त इस स्थान को हिन्दुओं द्वारा तीर्थस्थल माना जाता है। इस नगर के पुराने हिस्से में अधिकांशतः ब्राह्मण रहते हैं, जिनकी आजीविका तीर्थयात्रियों पर निर्भर करती है। अंग्रेज़ों ने इस क्षेत्र की संभावनाओं का पता लगाया और 1828 में पर्वतीय स्थल के रूप में आधुनिक नगर की स्थापना की थी। पहले यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के गवर्नर के नाम पर मैलकमपेथ कहलाता था।
महाबळेश्वर के पिछले इतिहास को देखा जाए तो लगभग १२१५ में देवगिरी के राजे सिंघण इन्होंने पुराने महाबळेश्वर को भेट दि तब उन्होंने कृष्णा नदी के किनारे झरने के पास एक छोटे से मंदीर और एक जलाशय बनाया। १६ वे शतक में चंद्रराव मोरे इस मराठी कुटुंब ने पहले के राजकुल का पराजीत किया और जावली और महाबळेश्वर के राजा बने। उस काल में इस मंदिर की पुनर्बांधणी की गई। १७ वे शतक में शिवाजी महाराज ने जावली और महाबळेश्वर अपने नियंत्रण में लिए और १६५६ में प्रतापगड किले का निर्माण किया।
सन १८१९ में ब्रिटीशाे ने सब पहाडी भाग साताऱा के राज्यों को एक जगह लाया। कर्नल लॉडविक यह सातार के स्थानिक अधिकारी थे। उन्होंने अप्रेल १८२४ में विभाग के सब सैनिक, बाडे के भारतीय और सहायक लेकर इस पॉइंट तक पहुँचे इसलिए वह अब लॉडविक पॉइंट के नाम से जाना जाता है। सन १८२८ से सर जॉन मॅल्कॅम, सर माऊंट स्टुअर्ट एल्फिंस्टन, आर्थर मॅलेट, करणक, फ्रेरे और अनेक लोगों ने भेट दी। महाबळेश्वर की पहचान १९२९-३० में हुई। इसके पहले यह माल्कम पेठ इस नाम से पहचाना जाता था। परंतु अब यह महाबळेश्वर है। महाबळेश्वर यहाँ“राज भवन” यह गरमी के दिनो में महाराष्ट्रा के राज्यपाल के निवासस्थान के लिए संरक्षित है। वह दी. टेरेस नाम के पुरानी इमारत में है। उसकी खरीदी १८८४ में की।

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Quelle: Text: Wikipedia – „महाबलेश्वर“, Autorinnen und Autoren (Versionsgeschichte), CC BY-SA 4.0 · Foto: Dinesh Valke from Thane, India, CC BY-SA 2.0 – Wikimedia Commons