देवास: इतिहास
देवास का इतिहास मराठा साम्राज्य की सैन्य और प्रशासनिक शक्ति का एक अनूठा उदाहरण है। पवार वंश की ऐतिहासिक सेवा का आरंभ छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से ही हो गया था, जहाँ उन्होंने दक्कन के विभिन्न अभियानों में सक्रिय योगदान दिया। छत्रपति शाहू महाराज के काल में, इस परिवार ने साम्राज्य के विस्तार के लिए मुगलों, निजामों और पुर्तगालियों के विरुद्ध कई महत्वपूर्ण युद्धों का नेतृत्व किया। उनकी वीरता और स्वराज्य के प्रति निष्ठा को देखते हुए, उन्हें 'सेना सप्त सहस्री' (Sena Sapt Sahasri) और 'विश्वास राव' (Vishwas Rao) जैसे उच्च वंशानुगत खिताबों से सम्मानित किया गया था।
वर्ष 1728 में, पेशवा बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में मालवा के निर्णायक अभियान के दौरान, तुकाजी राव (सीनियर) और जीवाजी राव (जूनियर) ने इस क्षेत्र में मराठा शक्ति को स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाई। इस विजय के परिणामस्वरुप देवास रियासत की नींव पड़ी। भाइयों के बीच क्षेत्र के विभाजन के बाद, उनके वंशजों ने 'बड़ी पाती' (Senior Branch) और 'छोटी पाति' (Junior Branch) के रूप में शासन किया। 1841 के उपरांत ये दोनों पूर्णतः अलग रियासतें बन गईं, हालांकि उनकी भौगोलिक सीमाएँ एक-दूसरे में इस प्रकार उलझी हुई थीं कि देवास शहर की मुख्य सड़क के दोनों किनारे अलग-अलग प्रशासन के अधीन थे।
देवास बाद में ब्रिटिश भारत की दो रियासतों की राजधानी भी बना था ।
1901 में वरिष्ठ शाखा की जनसंख्या 62,312 थी, जबकि कनिष्ठ शाखा की जनसंख्या 54,904 थी।
देवास जूनियर (छोटी पाति) और देवास सीनियर (बड़ी पाती) दरबार में कई सरदार, मानकरी, ठाकुर, जागीरदार और इस्तमुरादार थे।
1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, देवास के दोनों महाराजा (छोटी पाति और बड़ी पाती) भारत में शामिल हो गए, और उनके राज्य मध्य भारत में एकीकृत हो गए, जो 1950 में भारत का एक राज्य बन गया। बाद में, 1956 में, मध्य भारत को मध्य प्रदेश राज्य में मिला दिया गया।