काशीपुर, उत्तराखण्ड: इतिहास
नगर में प्राप्त सिक्कों और अन्य अवशेषों से पता चलता है कि यह क्षेत्र दूसरी शताब्दी के आसपास कुणिंद राजवंश के अधीन था। कान्ति प्रसाद नौटियाल ने अपनी पुस्तक, "आर्केलॉजी ऑफ़ कुमाऊँ" में गोविषाण का उल्लेख करते हुए लिखा है कि "कुमाऊँ क्षेत्र में ढिकुली, जोशीमठ तथा बाड़ाहाट के साथ-साथ गोविषाण भी कुणिंद राज्य के प्रमुख नगरों में से एक रहा होगा।" कुछ वर्ष पश्चात गुप्त राजवंश का शासन स्थापित होने से पहले इस क्षेत्र पर कुषाणों, और यादवों (यौद्धेय) द्वारा आक्रमण का भी उल्लेख है। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद राजा हर्ष (६०६-६४१ ईसवी) ने गोविषाण को अपना सामन्ती राज्य बना लिया। उस समय के कई खंडहर अभी भी शहर के पास विद्यमान हैं। माना जाता है कि काशीपुर कपड़े और धातु के बर्तनों का ऐतिहासिक व्यापार केन्द्र था।
हर्ष काल में चीनी यात्री ह्वेनसांग भी यहाँ आया था। ह्वेनसांग के अनुसार "मादीपुर से ६६ मील की दूरी पर गोविषाण नामक स्थान था जिसकी ऊँची भूमि पर ढाई मील का एक गोलाकार स्थान था। यहां उद्यान, सरोवर एवं मछली कुंड थे। इनके बीच ही दो मठ थे, जिनमें सौ बौद्ध धर्मानुयायी रहते थे। यहाँ ३० से अधिक हिन्दू धर्म के मंदिर थे। नगर के बाहर एक बड़े मठ में २०० फुट ऊँचा अशोक का स्तूप था। इसके अलावा दो छोटे-छोटे स्तूप थे, जिनमें भगवान बुद्ध के नख एवं बाल रखे गए थे। इन मठों में भगवान बुद्ध ने लोगों को धर्म उपदेश दिए थे।" १८६८ में भारत के तत्कालीन पुरातत्व सर्वेक्षक सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने इन वस्तुओं की खोज हेतु इस स्थान का दौरा किया किन्तु इन मठों में उन्हें ये वस्तुएँ, खासकर भगवान बुद्ध के नख एवं बाल नहीं मिले। अपनी रिपोर्ट में कनिंघम ने गोविषाण को किसी प्राचीन राज्य की राजधानी बताया, जिसकी सीमाओं का विस्तार वर्तमान उधमसिंहनगर, रामपुर तथा पीलीभीत जनपदों तक था।
आठवीं शताब्दी आते आते यह नगर कत्यूरी राजवंश के अधीन आ गया, जिनकी राजधानी कार्तिकेयपुरा में थी। ग्यारहवीं शताब्दी में कत्यूरी राजवंश के विघटन के बाद यह क्षेत्र पहले स्थानीय सरदारों के और फिर दिल्ली सल्तनत के शासनाधीन आ गया। तेरहवीं शताब्दी में कुमाऊँ के शासक गरुड़ ज्ञान चन्द (१३७४–१४१९) ने दिल्ली के सुल्तान से भाभर तथा तराई क्षेत्रों को उपहार स्वरूप पाकर उन पर अधिकार स्थापित किया। रुद्र चन्द (१५६८–१५९७) के शासनकाल में काठ तथा गोला के नवाब ने तराई क्षेत्रों पर अधिकार करने का प्रयास किया, परन्तु रुद्र चन्द ने उनके आक्रमण को निष्फल कर दिया। इसके बाद तराई क्षेत्रों को परगना का दर्जा देकर यहां एक अधिकारी की नियुक्ति की गई, और उसके निवास के लिए रुद्र चन्द ने रुद्रपुर नगर की स्थापना करी। रुद्र चन्द के बाद बाज बहादुर चन्द (१६३८–१६७८) ने रुद्रपुर के पश्चिम में बाजपुर नगर की स्थापना कर तराई के मुख्यालय वहां स्थानांतरित करने का एक विफल प्रयास किया। देवी चन्द (१७२०–१७२६) के शासनकाल में तराई के लाट काशीनाथ अधिकारी ने अपने निवास के लिए काशीपुर में महल का निर्माण करवाया, तथा तराई का मुख्यालय रुद्रपुर से यहां स्थानांतरित कर दिया।
काशीपुर में अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक चन्द राजवंश का शासन रहा। १७७७ में काशीपुर के अधिकारी, नन्द राम ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया और काशीपुर राज्य की स्थापना की। इसके २४ वर्ष बाद १८०१ में काशीपुर के तत्कालीन शासक, शिव लाल ने यह राज्य अंग्रेज़ों को सौंप दिया था, जिसके बाद काशीपुर ब्रिटिश भारत में एक राजस्व मण्डल बन गया। इसी समय में काशीपुर राज्य के राजकवि गुमानी पन्त ने इस नगर की विशेषताओं पर एक कविता भी लिखी थी, जिसमें उन्होंने नगर में बहती ढेला नदी, और मोटेश्वर महादेव मन्दिर का वर्णन किया है। १८१४ में आंग्ल गोरखा युद्ध छिड़ने पर ब्रिटिश सेना ने काशीपुर में पड़ाव डाला था, और कुमाऊँ क्षेत्र के अपने सभी अभियानों के लिए इस नगर का प्रयोग आधार पड़ाव के रूप में किया था। १० जुलाई १८३७ को काशीपुर को मुरादाबाद जनपद में शामिल किया गया और फिर १९४४ में बाजपुर, काशीपुर तथा जसपुर नगरों को काशीपुर नामक एक परगना में पुनर्गठित किया गया। काशीपुर को बाद में संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध के तराई जनपद का मुख्याल …