डीडवाना: इतिहास
डीडवाना का कोई संकलित इतिहास नही है, किन्तु यहां किए गए उत्खलन से पता चला है कि मानव जाति के पूर्वजो की गतिविधियां यहां रही है। शहर के पास बांगड़ नहर के बहाव क्षेत्र में 700 मीटर चौड़े एवं 300 मीटर चौड़े दो रेतीले टीले मानव विकास के साक्षी रहे है। डेक्कन कॉलेज, पुणे के भूगर्भ शास्त्री प्रो.वी.एन. मिश्रा एवं एस.एन राजगुरू ने यहां 80 के दशक में खुदाई की थी । उन्हे छोटे औजार, काटने के बड़े औजार जैसे चैपर, पोलीहैंड्रोस, स्पेरोईड्स सहित करीब 1300 आर्टिफैक्ट्स मिले। इनकी रेडियो डेटिंग उम्र 7 लाख 97 हजार वर्ष आंकी गई है । आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने इन टीलोंं को "16 आर" नाम दिया है। आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया अपने इतिहास में पहली बार इन मिट्टी के टीलों का संरक्षण करेगा। पेरिस के राष्ट्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय के प्रागैतिहासिक विभाग की क्लेरी गेलार्ड व उनके सहयोगियो ने 16 आर पर शोध किया।
डीडवाना का इतिहास शिलालेखों के आधार पर लगभग 2000 वर्ष प्राचीन बताया जाता है। एक शिलालेख के अनुसार 43 ईस्वी से 255 ई. के मध्य वर्तमान शहर से 3 किमी दूर पूर्व दिशा में "आभानगरी" के नाम से नगर बसाया गया जो कुषाण साम्राज्य के अधीन रहा। कालान्तर में क्षत्रप शासको के आक्रमणों के यह नगर उजड़ गया। एक अन्य शिलालेख के अनुसार नवीं शताब्दी में 843 ई. में नागभट्ट द्वितीय ने डीडवाना क्षेत्र का 1/6 भाग किसी ब्राह्मण को दान किया था। इसी क्षेत्र के प्रधानमंत्री शेषराम के पुत्र डीडूशाह ने वर्तमान स्थान पर डीडुवाणक नाम से पुन: नगर बसाया जो कालान्तर में डीडवाना कहलाया। इस के बाद इसका शासन मंडोर के प्रतिहारो के पास चला गया। डीडवाना से प्रतिहार कालीन योग नारायण की प्रतिमा प्राप्त हुई जो वर्तमान में जोधपुर संग्रहालय में रखी है। इस दौरान डीडवाना जैन एवं हिन्दू धर्म का केन्द्र भी बना किन्तु मुस्लिम आक्रमणों के कारण यहां के प्राचीन मंदिर नष्ट कर दिए गये । आज भी पुराने शहर में खुदाई में मंदिरो के टुकड़े व मुर्तियां मिलती रहती है। दसवीं सदी में जैन मुनि जिनेश्वर सूरि ने डीडवाना में कथाकोष की रचना की । विख्यात जैन विद्वान श्रीदत्त सूरि ने डीडवाना की यात्रा की तथा यहां के शासक यशोभद्र को उपदेश दिया। यशोभद्र ने डीडवाना में "चौबीसा हिमालय" नामक एक विशाल जैन मंदिर का निर्माण कराया जो 1184 ई.तक अस्तित्व में था, सोमप्रभाचार्य ने 1184 ई. में इस जिनालय का उल्लेख किया है। खुदाई में प्राप्त जैन प्रतिमाएं इस का प्रमाण है। बारहवीं शताब्दी में सिद्धसेन सूरि द्वारा रचित सकलतीर्थ माला में भी डीडवाना का उल्लेख है।
तराईन के युद्ध के बाद यह क्षेत्र मुहम्मद गौरी के हाथो में चला गया। इस के बाद कुतूबुद्दीन ऐकब के पास 1206 ई. से 1210 ई.तक रहा। इसके बाद 1226 ई. से 1236 ई. तक इल्तुतमिश तथा 1242 ई. में रजिया सुल्तान के कब्जे में रहा। डीडवाना पर गुजरात के बादशाहों ने भी नमक के लिए कब्जा किया। चितौड़ के महाराणा कुंभा ने यहां कब्जा कर नमक पर कर लगाया जिसका उल्लेख कीर्तिस्तंभ के शिलालेख में किया है। मुगलों नें यहां अपने थाने स्थापित किए। जहा पठानों को शहर की सुरक्षा के लिए बसाया गया. डिडवाना मे स्थित पठानों की पोल इसका प्रमाण है, पठानों को यहा जगीरदारी भी सोंपी गयी,इस दौरान मुगलों ने यहां मस्जिदों का निर्माण कराया। जोधपुर के राव मालदेव के ने अपने सेनापति राव कूंपा को डीडवाना की जागीरी प्रदान की। कूंपा ने यहां शेरशाह सूरी से युद्ध लड़ा। मुगलो के हाथों से यह पुनः जोधपुर राज्य के अन्तर्गत चला गया । 1708 ई. …