Heimatgeschichte · Kalpi ·

कालपी: इतिहास

कालपी: इतिहास

ऐतिहासिक नगर है जहाँ पुराने समय से लगातार राजनीतिक उथल-पुथल होती रही है। सन् ११९६ ई. में यह नगर कुतुबुद्दीन के आधिपत्य में आया। पंद्रहवी शताब्दी में जौनपुर के इब्राहिम शाह ने कालपी को जीतने के लिए दो बार प्रयास किया लेकिन असफल रहे और नगर पर मालवा के होशांग शाह का पूर्ण अधिकार हो गया। कुछसमय बाद इब्राहिम के वंशज महमूद को कालपी पर कब्जा करने को कहा गया लेकिन शर्त थी कि उसके राज्यपाल को दंडित किया जाए। यह शर्त महमूद को मंजूर न थी। अत: दिल्ली के शासकों और जौनपुर राज्य के बीच कालपी को लेकर काफी दिनों तक संघर्ष चलता रहा और सन् १४७७ ई. में यहाँ एक भयंकर युद्ध हुआ जिसमें जौनपुर के हुशेनशाह भागकर कन्नौज चले गए। वहाँ भी वे पुन: पराजित हुए। सन् १५२६ ई. में पानीपत की विजय के बाद आक्रांता बाबार का मार्ग दक्षिण की ओर स्वत: खुल गया। राणा के वंशजों और अफगानों ने मिलकर उनका रास्ता रोकना चाहा। इन्होंने कालपी पर अधिकार तो कर लिया लेकिन बाद में हार खानी पड़ी। सन् १५२७ ई. में जौनपुर और बिहार दोनों पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद बाबर ने कालपी पर अधिकार कर लिया। हुमायूँ ने कालपी को अपने अधिकार में सन् १५४० ई. तक रखा। अकबर के समय में कालपी सरकार का मुख्यालय रहा। बाद में मराठों ने इस नगर को राज्यपाल के मुख्यालय का रूप दिया।

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Quelle: Text: Wikipedia – „कालपी“, Autorinnen und Autoren (Versionsgeschichte), CC BY-SA 4.0 · Foto: Aryan ghosh, CC BY-SA 3.0 – Wikimedia Commons