तिलहर: इतिहास
शाहजहाँपुर गजेटियर के अनुसार तिलहर को वर्तमान नाम अकबर के एक वफादार वाछिल राजपूत त्रिलोकचन्द्र के नाम पर दिया गया था। शाहजहाँपुर तो बहुत बाद में शाहजहाँ के सिपहसालारों बहादुर खाँ और दिलेर खाँ द्वारा बसाया गया। यह दीगर बात है कि मुगल बादशाह के नाम पर होने के काऱण शाहजहाँपुर तो जिला बन गया जबकि तिलहर तहसील ही बनकर रह गया। त्रिलोकचन्द्र राजपूत का बनबाया हुआ किला आज भी तिलहर के दातागंज मोहल्ले में है। इसके तीन बड़े-बड़े फाटकों में से एक फाटक टूट चुका है। शेष दो फाटक व किले की मोटी-मोटी दीवारों के अवशेष आज भी यहाँ विद्यमान हैं। तिलहर के दक्षिण में लगभग सात किलोमीटर दूरी पर इन्हीं त्रिलोकचन्द्र के नाम पर बसाया गया गाँव तिलोकपुर स्थित है वहाँ तक अब सड़क भी बन गयी है।
तिलहर शाहजहाँपुर जिले का सबसे पुराना शहर कहा जाता है। अकबर के काल से ही मुगलों की सेना के लिये तीर-कमानों की आपूर्ति करने के लिये इसे पहले "कमान नगर" (हालांकि अधिकांश तिल मोमफली और तिलहन आधि की फसलो के कारण तिलयडगढ़ के नाम भी प्रच लन में रहा)कहा जाता था। हाफिज रहमत अली खाँ के नाजिम मुहम्मद उमर के बेटे मंगल खाँ ने तिलहर के निकट मंसूरपुर गाँव में एक आलीशान किला बनबाया था जो उसके उत्तराधिकारियों के कब्जे में 1857 के प्रथम स्वातन्त्र्य समर तक रहा। बाद में इसे ब्रिटिश सरकार ने हथिया लिया। अंग्रेजों ने तिलहर को पहली बार मालगुजारी वसूलने की दृष्टि से तहसील घोषित किया और क्षेत्र के किसानों को नियन्त्रित करने के लिये तिलहर में पहला पुलिस थाना स्थापित किया ताकि आगे कोई बगावत न कर सके।