Heimatgeschichte · Haldwani ·

हल्द्वानी: इतिहास

हल्द्वानी: इतिहास

यह क्षेत्र कत्यूरी रानी जिया रानी के गौरव की महिमा का इतिहास को समर्पित है। कत्यूरी सैनिकों द्वारा तुर्क सैनिकों को इसी स्थान पर हराकर दिल्ली सल्तनत के प्रभाव से वांछित रहा। इसी प्रकार कत्यूरी साम्राज्य से चंद वंश के पश्चात यह क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन हुआ।
सन् १८५६ में सर हेनरी रैम्से ने कुमाऊँ के आयुक्त का पदभार संभाला। १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतंत्रा संग्राम के दौरान इस क्षेत्र पर थोड़े समय के लिये रोहिलखण्ड के विद्रोहियों ने अधिकार कर लिया। तत्पश्चात सर हेनरी रैम्से द्वारा यहाँ मार्शल लॉ लगा दिया गया और १८५८ तक इस क्षेत्र को विद्रोहियों से मुक्त करा लिया गया।
इसके बाद सन् १८८२ में रैम्से ने नैनीताल और काठगोदाम को सड़क मार्ग से जोड़ दिया। सन् १८८३-८४ में बरेली और काठगोदाम के बीच रेलमार्ग बिछाया गया। २४ अप्रैल, १८८४ के दिन पहली रेलगाड़ी लखनऊ से हल्द्वानी पहुंची और बाद में रेलमार्ग काठगोदाम तक बढ़ा दिया गया।
सन् १९०१ में यहाँ की जनसँख्या ६,६२४ थी और सयुंक्त प्रान्त के नैनीताल ज़िले के भाभर क्षेत्र का मुख्यालय हल्द्वानी में ही स्थित था। और साथ ही ये कुमाऊँ मण्डल और नैनीताल ज़िले की शीत कालीन राजधानी भी हुआ करता था। सन् १९०१ में आर्य समाज भवन और १९०२ में सनातन धर्मं सभा का निर्माण किया गया। सन् १८९९ में यहाँ तहसील कार्यालय खोला गया जब इसे नैनीताल ज़िले के चार भागों में से एक भाभर का मुख्यालय बनाया गया और कुल ४ क़स्बों और ५११ ग्रामों के साथ इसकी कुल जनसँख्या ९३,४४५ (१९०१) थी और ये ३,३१३ वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ था। १८९१ तक अलग नैनीताल ज़िले के बनाने से पहले तक ये कुमांऊ ज़िले का भाग था जिसे अब अल्मोड़ा ज़िले के नाम से जाना जाता है।
सन् १९०४ में इसे "अधिसूचित क्षेत्र" की श्रेणी में रखा गया और १९०७ में हल्द्वानी को क़स्बा क्षेत्र घोषित किया गया। हल्द्वानी से ४ किमी दूर दक्षिण में स्थित गोरा पड़ाव नामक क्षेत्र है। १९ वीं सदी के मध्य में यहाँ एक ब्रिटिश कैंप हुआ करता था जिसके नाम पर इस क्षेत्र का नाम पड़ा। "गोरा" शब्द ब्रिटिशों लिए उपयोग में लाया जाने वाला कठबोली शब्द था।

von Fremdinhalte · Regionauts

Quelle: Text: Wikipedia – „हल्द्वानी“, Autorinnen und Autoren (Versionsgeschichte), CC BY-SA 4.0 · Foto: amit_deol, CC BY 3.0 – Wikimedia Commons