रामचरितमानस
जल सीकर महिरज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं॥
भव भञ्जन गञ्जन सन्देहा। जन रञ्जन सज्जन प्रिय एहा॥
राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं॥
बिमल कथा हरिपद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी॥
मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई॥
मुनि दुर्लभ हरिभगति नर, पावहिं बिनहिं प्रयास।
जे यह कथा निरन्तर, सुनहिं मानि बिस्वास॥
सोइ सर्बज्ञ गुनी सोइ ज्ञाता। सोइ महि मंडित पंडित दाता॥
धर्म परायन सोइ कुलत्राता। रामचरन जाकर मन राता॥
— तुलसीदास