Gedichte · Assam ·

कवितावली

सीस जटा, उर बाहु बिसाल, बिलोचन लाल, तिरीछीसी भौंहैं।

तून, सरासन, बान धरे, तुलसी बन-मारग में सुठि सोहैं॥

सादर बारहि बार सुभाय चितै सुम त्योँ हमरो मन मोहैं।

पूँछति ग्रामवधू सिय सों “कहो साँवरे से, सखि! राबरे को हैं”?॥१॥

पुर तें निकसी रघुबीर-बधू, धरि धीर दये सग में डग द्वै।

झलकीं भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गये मधुराधर वै॥

फिरि बुझति हैं चलनो अब केतिक, पर्णकुटी करिहौ कित ह्वै।

तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै॥

गर्भ के अर्भक काटन कों पटु धार कुठार कराल है जाको।

सोई हौं बूझत राजसभा "धनु को दल्यौ," हौं दलिहौं बल ताको॥

लघु आनन उत्तर देत बड़ो लरिहै, मरिहै करिहै कछु साको।

गोरो, गरूर गुमान भरो, कहौ कौसिक छोटो सो ढोटा है काको॥

बिंध्य के बासी उदासी तपाब्रत-धारी महा बिनु नारि दुखारे।

गौतम तीय तरी, तुलसी, सो कथा सुनि भे मुविवृन्द सुखारे॥

ह्वैहैं सिला सब चन्द्रमुखी परसे पद-मंजुल-कंज़ तिहारे।

कीन्ही भली रघुनायकजू करुना करि कानन को पगु धारे॥

न मिटै भवसंकट दुर्घट है तप तीरथ जन्म अनेक अटो।

कलि में न विराग न ज्ञान कहूँ सब लागत फोकट भूँँठ जटो॥

नट ज्यों जनि पेट कुपेटक कोटिक चेटक कौतुक ठाट ठटो।

तुलसी जो सदा सुख चाहिय तो रसना निसि-बासर राम रटो॥

लाथिन सों लोहू के प्रवाह चले जहां तहां, मानहुँ गरिन गेरु झरना झरत हैं।

सोनित सरित घोर, कुंजर करारे भारे, कूल ते समूल बाजि-बिटप परत है॥

सुभट सरीर नीर बारी भारी भारी तहां, सूरनि उछाह, कूर कादर डरत हैं।

फेकरि फेकरि फेरु-फारि फारि पेट खात, काक कंक-बालक कोलाहल करत हैं॥१॥

ओझरी की झोरी काँधे, आसवि की सेल्ही वांधे, सूँड़ के कमंडलु, खपर किये कोरि कै।

जोगिनी झुटुंग झुंड-झुंड बनी तापसी सी तीर-तीर बैठीं सो समर सरि खोरि कै॥

सोनित सो सानि सानि गूदा खात सतुआ से, प्रेत एक पियत बहारि घोरि घोरि कै।

तुलसी बैताल भूत साथ लिये भूतनाथ हेरि हेरि हँसत हैं हाथ जोरि जोरि कै॥२॥

अद्भुत

बल्कल बसन, धनुबान पानि, नून कटि, रूप के निधान, बन-दामिनी बरन हैं।

तुलसी सुतीय सङ्ग सहज सुहाये अङ्ग, नवल कँवल हू ते कोमल चरन हैं॥

औरै सो घसंत, औरै रति, औरै रतिपति, मूरति बिलोके तन मन के हरन हैं।

तापस वेषै बनाइ, पथिक पथै सुहाइ, चले लोक-लोचननि सुफल करम हैं॥१॥

लीन्हो उखारि पहार बिसाल, चल्यो तेहि काल, विलंब न लायों।

मारुतनंदन भारत को, मन को, खगराज को अंग लजायो॥

तीखी तुरा तुलसी कहो, पै हिये उपमा को समाउ न आयो।

माना प्रतच्छ परब्बत की नभ लीक लसी कपि यों धुकि धायो॥२॥

भयानक

जहाँ तहाँ बुत्रुक विलोकि बुवुकारी देत “जरत निकेत धाओ धाओ लागि आगि रे।

कहाँ तात, मात, आत, भगिनी, भामिनी, भाभी, छोटे छोटे छोहरा अभागे भोरे भागि रे॥

हाथी छोरो, घोरा छोरी, महिष वृषम छोरो, छेरी छोरो, सोवै सो जगाओ जागि जागि रे।

'तुलसी' बिलोकि अकुलानी जातुधानी कहैं, "वार वार कह्यौ पिय कपि स न लागि रे"॥

वीर

जाकी बाकी बीरता सुनत सहमत सूर, जाकी आँच अजहूँ खसत लंक लाह सी।

खोई हनुमान बलवान बाँके बानइत, जोहि जातुधान-सेना चले लेत थाह सी॥

कंपत अकंपन सुखाय अतिकाय काय, कुंभऊकरन आइ रह्यो पाइ आह सी।

देखे गजराज मृगराज ज्यों गरजि धायो बीर रघुवीर को समीर-सूनु साहसी॥

(७) खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि, वनिक को बविज न चाकर को चाकरी।

जीविका-विहीन लोग सीधमान सोच बस, कहैं एक एकन सौ "कहाँ जाइ, का करी"।

बेद हूँ पुरान कही, लोकहू बिलोकियत, साकरे सबै पै राम रावरे कृपा करी।

दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु ! दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी ॥

(क) कुल, करसूति, भूति, कीरति, सुरूप, गुन जोवन जुर जरत, परै न कल कही।

राज काज कुपथ कुसाज, भोग रोग ही के, वेद-बुध विद्या पाइ विवश बलकही।

गति तुलसीस की लखै न कोउ जो करत, पब्बइते छार, छारै पब्बइ पलकहीं।

कासों कीजै रोष ? दोष दीजै काहि ? पाहि राम ! कियो कलिकाल कुलि खलल खलकहीं ॥

(१) बबुर बहेरे को बनाइ बाग बाइयत, सँधिबे को साइ सुरतरु काटियत है।

गारी देत नीच हरिचन्द हू दधीचि हूँ को, आपने धना चबाइ हाथ चाटियत है।

श्राप महापातकी हँसत हरि हरहू को, आयु है प्रभागी भूरिभागी डाटियत है।

कलि को कलुष मन मलिन किये महत मसक की पांसुरी पयोधि पाटियत है।

— तुलसीदास

von Fremdinhalte · Regionauts

Quelle: तुलसीदास († 1623) · gemeinfrei · Wikisource