प्रियप्रवास
तुलसी गंग दुवौ भये सुकविन के सरदार।
इनके काव्यन मे मिली भाषा विविध प्रकार॥
निदाघ ज्वाला से विचलित हुआ चातक अभी ।
भुलाने जाता था निज विमल वश-व्रत सभी ।।
दिया पत्र द्वारा नव बल मुझे आज तुमने ।
सुसाक्षी है मेरे विदित कुल-देव ग्रह पति ।।
— अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'