Gedichte · Punjab ·

प्रियप्रवास

तुलसी गंग दुवौ भये सुकविन के सरदार।

इनके काव्यन मे मिली भाषा विविध प्रकार॥

निदाघ ज्वाला से विचलित हुआ चातक अभी ।

भुलाने जाता था निज विमल वश-व्रत सभी ।।

दिया पत्र द्वारा नव बल मुझे आज तुमने ।

सुसाक्षी है मेरे विदित कुल-देव ग्रह पति ।।

— अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

von Fremdinhalte · Regionauts

Quelle: अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' († 1947) · gemeinfrei · Wikisource