अजमेर जिला: इतिहास
राजपुताना व बंबई गजट के अनुसार अजमेर पर 700 वर्षों तक राजपूत चौहानों का राज था।
अजमेर में 1153 ई में बिसलदेव चौहान उर्फ सम्राट विग्रहराज चौहान या विग्रहराज चतुर्थ (1153-1163 ई) के एक क्षत्रिय राजपूत सम्राट थे, उन्होने अपने पड़ोसी राजाओं को जीतकर राज्य को एक साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया इन्होंने अपने क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्तों को घुसने नहीं दिया। इन राजा के राज्य में वर्तमान राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के क्षेत्र सम्मिलित थे। उनकी राजधानी अजयमेरु (वर्तमान अजमेर) थी जहाँ उन्होने अनेकों भवनों का निर्माण कराया। जब अजमेर पर मुसलमान शासकों का आधिपत्य हो गया तो उनमें से अधिकांश भवनों को या तो नष्ट कर दिया गया या उन्हें 'इस्लामी भवनों' में परिवर्तित कर दिया गया। इन्हीं में से वीसलदेव द्वारा निर्मित सरस्वतीकण्ठाभरणविद्यापीठ था जो संस्कृत अध्ययन का केन्द्र था। इसे बदलकर 'अढाई दिन का झोपड़ा' नामक मस्जिद बना दी गयी। विग्रहराज जी को 'बिसल देव' उपनाम से बेहतर जाना जाता था। ://en.m.wikipedia.org/wiki/Taragarh_Fort,_Ajmer
कुछ विद्वानों का मत है, कि इसका निर्माता कुतुबुद्दीन ऐबक था।
कहावत है, कि यह इमारत अढ़ाई दिन में बनकर तैयार हुई थी, किन्तु ऐतिहासिकों का मत है, कि इस नाम के पड़ने का कारण इस स्थान पर मराठा काल में होने वाला अढ़ाई दिन का मेला है। इस इमारत की क़ारीगरी विशेषकर पत्थर की नक़्क़ाशी प्रशंसनीय है।मुहम्मद ग़ौरी ने जब 1192 ई. में भारत पर आक्रमण किया, तो उस समय अजमेर राजपूत राजा पृथ्वीराज तृतीया के राज्य का एक बड़ा नगर था।
पृथ्वीराज तृतीया की पराजय के पश्चात दिल्ली पर मुसलमानों का अधिकार होने के साथ अजमेर पर भी उनका क़ब्ज़ा हो गया और फिर दिल्ली के भाग्य के साथ-साथ अजमेर के भाग्य का भी निपटारा होता रहा।
1193 में दिल्ली के ग़ुलाम वंश ने इसे अपने अधिकार में ले लिया।
मुग़ल सम्राट अकबर को अजमेर से बहुत प्रेम था, क्योंकि उसे मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा में बड़ी श्रृद्धा थी। एक बार वह आगरा से पैदल ही चलकर दरग़ाह की ज़ियारत को आया था। मुईनुद्दीन चिश्ती 12वीं शती ई. में ईरान से भारत आए थे। अकबर और जहाँगीर ने इस दरग़ाह के पास ही मस्जिदें बनवाई थीं। शाहजहाँ ने अजमेर को अपने अस्थायी निवास-स्थान के लिए चुना था। निकटवर्ती तारागढ़ की पहाड़ी पर भी उसने एक दुर्ग-प्रासाद का निर्माण करवाया था, जिसे विशप हेबर ने भारत का जिब्राल्टर कहा है। यह निश्चित है, मुगलकाल में अजमेर को अपनी महत्त्वपूर्ण स्थिति के कारण राजस्थान का नाक़ा समझा जाता था। अजमेर के पास ही अनासागर झील है, जिसकी सुन्दर पर्वतीय दृश्यावली से आकृष्ट होकर शाहजहाँ ने यहाँ पर संगमरमर के महल बनवाए थे। यह झील अजमेर-पुष्कर मार्ग पर है। सन् 1878 में अन्ग्रेजों ने वर्धनोरा (बदनोरा) राज्य में अजमेर और केकड़ी प्रान्त को शामिल कर अजमेर मेरवाड़ा के नाम से संयुक्त स्टेट बनाकर केन्द्रीय शासक प्रदेश बनाया था। 1956 में यह राजस्थान राज्य का हिस्सा बन गया। अरबों से युद्ध भूमि में लड़ते हुए राणा सांगा की भाती इनका दाहिना हाथ कट गया था। बीसलदेव चौहानचौहान वंश की सबसे प्रतापी राजा जिन्होंने अजमेर पर शासन किया वह अजमेर का साम्राज्य आधुनिक मेवाड़ का साम्राज्य भी इसमें सम्मिलित था जैसे भीलवाड़ा राजसमंद इन्हीं के साम्राज्य में आते थे।