मधेपुरा जिला: इतिहास
=== नामकरण ===
मधेपुरा के नामकरण के संबंध में कई कहानियाँ हैं, हालाँकि इतिहासकारों द्वारा इसके नामकरण के संबंध में आम तौर पर दो स्वीकृत सिद्धांत हैं; एक मत यह है कि चूंकि मधेपुरा कोसी घाटी के मध्य में स्थित है, इसलिए इसे मध्यपुरा कहा जाता था, जो बाद में बदलकर मधेपुरा हो गया। दूसरा मत यह है कि कहा जाता है कि इस क्षेत्र में माधववंशियों (यादवों का शाखा) की बहुलता के कारण इसे माधवपुरा कहा जाता था जो कालान्तर में माधवपुरा से मधेपुरा बन गया।
प्राचीन काल में मधेपुरा मिथिला राज्य का हिस्सा था।
ऐसा माना जाता है कि पौराणिक काल में कोशी नदी के तट पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम था। श्रृंगी ऋषि भगवान शिव के भक्त थे और वह आश्रम में भगवान शिव की प्रतिदिन उपासना किया करता था। श्रृंगी ऋषि के आश्रम स्थल को श्रृंगेश्वर के नाम से जाना जाता था। कुछ समय बाद इस उस जगह का नाम बदलकर सिंहेश्वर हो गया। महाजनपद काल में मधेपुरा अंग महाजनपद का हिस्सा था। मौर्य वंश का भी यहां शासन रहा। इसका प्रमाण उदा-किशनगंज स्थित मौर्य स्तम्भ से मिलता है। गुप्त वंश के शासन काल में यह मिथिला प्रांत का हिस्सा रहा। मधेपुरा का इतिहास कुषाण वंश के शासनकाल से भी सम्बन्धित है। शंकरपुर प्रखंड के बसंतपुर तथा रायभीर गांवों में रहने वाले भर समुदाय के लोग कुशान वंश के परवर्ती हैं।
मुगल काल में मधेपुरा सरकार तिरहुत के अधीन रहा। उदा-किशुनगंज अंतर्गत सरसंडी गांव में अकबर के समय की एक मस्जिद आज मौजूद है। इसके अतिरिक्त, सिकंदर साह ने भी जिले का दौरा किया था, जो साहुगढ़ गांव से मिले सिक्कों से स्पष्ट होता है।
श्रीनगर
मधेपुरा शहर से लगभग २२ किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम में स्थित श्रीनगर एक गांव है। इस गांव में दो किले हैं। माना जाता है कि इनसे से एक किले का इस्तेमाल राजा श्री देव रहने के लिए किया गया था। किले के पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर दो विशाल कुंड स्थित है; पहले कुंड को हरसैइर और दूसर कुंड को घोपा पोखर् के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त यहां एक मंदिर भी है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर में स्थित पत्थरों से बने स्तंभ इसकी खूबसूरती को और अधिक बढ़ाते हैं। यहां की शीलालेख लगभग 3000 से 5000 ईसा पूर्व की मानी जाती है।
बसन्तपुर
मधेपुरा के दक्षिण से लगभग 24 किलोमीटर की दूरी पर बसंतपुर गांव स्थित है। यहां पर एक किला है जो कि पूरी तरह से विध्वंस हो चुका है। माना जाता है कि यह किला राजा विराट के रहने का स्थान था।
बिराटपुर
सोनबरसा रेलवे स्टेशन से लगभग 9 किलोमीटर की दूरी पर बिराटपुर गांव है। यह गांव देवी चंडिका के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि इस मंदिर का सम्बन्ध महाभारत काल से है। 11वीं शताब्दी में राजा कुमुन्दानंद के सुझाव से इस मंदिर के बाहर पत्थर के स्तम्भ बनवाए गए थे। इन स्तम्भों पर अभिलेख देखे जा सकते हैं। इसके साथ ही यहां पर दो स्तूप भी है। मंदिर के पश्चिम से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा टीला है।