हरिद्वार जिला: इतिहास
वर्तमान हरिद्वार क्षेत्र छठी शताब्दी ईसा पूर्व में प्राचीन कोशल राज्य का हिस्सा था, जो बाद में नंद तथा मौर्य वंश द्वारा शासित मगध साम्राज्य का हिस्सा बन गया। १८४ ईसा पूर्व में मौर्य वंश के पतन के साथ ही यह शुंग राजवंश के वर्चस्व के अधीन आ गया, और ७२ ईसा पूर्व तक रहा। इसके बाद यहां २२६ ईस्वी तक कुशानों का राज चलने के बाद ३२० ईस्वी से ९८० ईस्वी के अंत तक गुप्त साम्राज्य का शासन रहा।
दिल्ली सल्तनत के शासनकाल के समय यह क्षेत्र दिल्ली सूबे का हिस्सा था। अकबर और उनके तत्काल उत्तराधिकारियों के समय में यह सहारनपुर में रहने वाले अधिकारी के अधीन था, और उस समय सहारनपुर और हरिद्वार में तांबे के सिक्कों के टकसाल थे। जिले के बाद के इतिहास में सिखों और मराठों के आक्रमण का उल्लेख है। १८५७ के विद्रोह के समय रुड़की, कनखल, ज्वालापुर और हरिद्वार के जंगलों में स्वतंत्रता सेनानियों और ब्रिटिश सेना के बीच कई छिटपुट लड़ाइयाँ भी लड़ी गई थी।
ब्रिटिश काल में इस क्षेत्र में प्रशासनिक सुधार, राजस्व समाधान, शैक्षिक और चिकित्सा सुविधाओं, और स्थानीय स्वशासन पर काफी काम प्राधिकारियों द्वारा शुरू किया गया था। मंगलौर, हरिद्वार और रुड़की में क्रमशः १८६० , १८७३ और १८८४ में नगरपालिका बोर्ड स्थापित किए गए थे। हरिद्वार में १९०० में गुरुकुल कांगडी की स्थापना हुई, जो बाद के वर्षों में प्राच्य अध्ययन (प्राचीन भारतीय संस्कृति के आधार पर) के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ, और साथ ही कांग्रेस द्वारा चलाये गए विभिन्न आंदोलनों के लिए गढ़ भी रहा।
हरिद्वार जिला, सहारनपुर डिवीजनल कमिशनरी के भाग के रूप में २८ दिसम्बर १९८८ को अस्तित्व में आया। २४ सितंबर १९९८ के दिन उत्तर प्रदेश विधानसभा ने 'उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक, १९९८' पारित किया, अंततः भारतीय संसद ने भी 'भारतीय संघीय विधान - उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम २०००' पारित किया, और इस प्रकार ९ नवम्बर २०००, के दिन हरिद्वार भारतीय गणराज्य के २७वें नवगठित राज्य उत्तराखण्ड (तब उत्तरांचल), का भाग बन गया।