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टोंक जिला: इतिहास

टोंक जिला: इतिहास

भले ही इस शहर के इतिहास की कोई लम्बी–चौड़ी तहरीर जिला गजेटियर, जनगणना-दस्तावेजों और इतिहास के ग्रंथों में न अंकित न हो, यह बात निर्विवाद है कि टोंक, जयपुर से पुराना है। हनुमान सिंघल ने साहित्य-कला-संगम द्वारा प्रकाशित अपनी एक पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ़ टोंक’ में यहाँ के इतिहास पर प्रकाश डाला है ।
यहाँ से कुछ दूर रणथम्भोर जाने वाले मार्ग में ग्राम ‘ककोड़’ में विशाल ग्रेनाइट शिला से निर्मित एक विशालकाय हाथी, जो 12वीं सदी की रचना है, इस इलाके में सभ्यता की पुरानी रिहाइश का सबूत है ... भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित एक ही चट्टान (Monolithic Rock) में से उत्कीर्ण इस वास्तविक ऊंचाई के हाथी के दाहिने कान में इस बड़े सारे मूर्तिशिल्प के निर्माण की तिथि अंकित है!
महाभारत काल में टोंक को ‘संवाद लक्ष्य’ के नाम से जाना जाता था। मौर्य शासन में यह मौर्यों के अधीन था और फिर इसे मालवा राज्य में मिला दिया गया था। यह अधिकांश काल तक हर्षवर्धन के अधीन रहा । चीन के आगंतुक यात्री ह्वेन त्सांग के अनुसार, यह तब बैराठ राज्य के अधीन आता था। राजपूतों के शासन में, यह राज्य टोडा के सोलंकी शासकों के अधीन रहा और बाद में इस पर कछवाहों ने कब्जा कर लिया जब राजा मानसिंह ने टोडारायसिंह के राव को हराया। मानसिंह के बाद, यह होल्कर और सिंधिया के शासन में आ गया ।
स्थानीय अभिलेखों के अनुसार अकबर के शासन-काल में ‘टोडी’ और ‘टोंकड़ा’ नाम के दो जिले आमेर के राजा मुग़ल- सेनापति मानसिंह ने पिंडारियों और अन्य कब्जेदारों से जीते थे, जिनमें से ‘टोंकड़ा’ इलाके के 12 बेचिराग गाँव (जो गैर-आबाद गाँव थे) भोला नाम के किसी ब्राह्मण को भूमि-दान में दे दिए गए थे, जिसने अपने इस इलाके का नया नामकरण टोंकड़ा’ से ‘टोंक’ किया!
25 मार्च 1948 को एक राज्य के रूप में राजस्थान-निर्माण से पहले टोंक 4 निज़ामतों- टोंक, पिड़ावा, सिरोंज, निम्बाहेड़ा, छबड़ा, और एक नायब-निज़ामत, अलीगढ़ (उनियारा) से मिल कर बना था, आज टोंक के उत्तर में जयपुर, दक्षिण में कोटा, बूंदी और भीलवाड़ा, पूर्व में सवाई माधोपुर और पश्चिम में अजमेर हैं।
टोंक निजामत (राज्य) के संस्थापक थे- नवाब मुहम्मद अमीर खान (1769-1834), जो पश्तून वंश के एक साहसी सैन्य नेता थे। अमीर खान 1798 में मराठा साम्राज्य के यशवंतराव होल्कर की सेवा में एक सैन्य कमांडर बन गये। 1806 में, अमीर खान ने यशवंतराव होल्कर से टोंक का राज्य प्राप्त किया था 1817 में, तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद, अमीर खान ने अपना राज्य ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया। नतीजतन, उन्होंने टोंक को अपना इलाका बनाए रखा और नवाब की उपाधि भी प्राप्त की। टोंक राज्य आंतरिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए और ब्रिटिश साम्राज्य ख़त्म होने पर राजस्थान का हिस्सा रहा जिसमें छह अलग-अलग जिले शामिल थे। इनमें से तीन तो राजपूताना एजेंसी के अधीन थे, टोंक, अलीगढ़ (पूर्व में रामपुरा) और निम्बाहेड़ा। अन्य तीन, छाबड़ा, पिरावा और सिरोंज सेंट्रल इंडिया एजेंसी में शामिल थे। टोंक राज्य के एक पूर्व मंत्री साहिबज़ादा ओबेदुल्ला खान को 1897 के तिराह अभियान के दौरान पेशावर में राजनीतिक दायित्व पर प्रतिनियुक्त किया गया था। नवाब सर मुहम्मद इब्राहिम अली खान जीसीआईई (शासनकाल 1867-1930) उन कुछ प्रमुखों में से एक थे जिन्होंने 1877 में लॉर्ड लिटन के दरबार और 1903 के दिल्ली दरबार में शासक के रूप में भाग लिया था ।
1899-1900 में, टोंक राज्य को सूखे के कारण बहुत संकट का सामना करना पड़ा। यहाँ की रियासत की सालाना आमदनी 1883-84 में 1,28,546 पोंड थी! सन् 1817 में टोंक एक ब्रिटिश संरक्षित राज्य बन गया था । 1947 में, भारत के विभाजन पर, जिससे भारत और पाकिस्तान को स्वतंत्रता मिली, टोंक के नवाब ने भारत में शामिल होने का फैसला किया। इसके बाद, टोंक राज्य के अधिकांश क्षेत्र को राजस्थान राज्य में एकीकृत किया गया, जबकि इसके कुछ पूर्वी परिक्षेत्र मध्य प्रदेश का हिस्सा बन गए। भारत की स्वतंत्रता के बाद, टोंक 25 मार्च 1948 को भारतीय गणराज्य में शामिल हो गया। …

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Quelle: Text: Wikipedia – „टोंक जिला“, Autorinnen und Autoren (Versionsgeschichte), CC BY-SA 4.0