श्योपुर ज़िला: इतिहास
श्योपुर तथा उसके किले का इतिहास मध्यकालीन और आधुनिक भारत की अनेक राजनीतिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है। परंपरा के अनुसार नगर और किले की स्थापना 1537 में इंद्र सिंह गौर ने की थी, जो जयपुर से संबद्ध गौर राजपूतों के सामंत थे।
इस क्षेत्र का प्रारंभिक ऐतिहासिक उल्लेख नीमत उल्लाह के लेखन में मिलता है, जिसमें सिकंदर लोदी के एक सैन्य अभियान का वर्णन है। यह अभियान स्थानीय शासक राज डूंगर के समर्थन में चलाया गया था, जिन्होंने बाद में इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। 16वीं शताब्दी में अकबर ने चित्तौड़गढ़ अभियान के दौरान इस क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लिया। इसके बाद श्योपुर को रणथंभौर सरकार के अंतर्गत एक महल (राजस्व एवं प्रशासनिक इकाई) का मुख्यालय बनाया गया।
1808 में दौलत राव सिंधिया ने श्योपुर पर अधिकार कर लिया और इसे अपने फ्रांसीसी मूल के सेनापति जीन बैप्टिस्ट फिलोज़ को जागीर के रूप में प्रदान किया। फिलोज़ ने किले में शेष बचे गौर राजपूतों को पराजित कर 1809 में उन्हें किला छोड़ने पर विवश कर दिया। सिंधिया शासन के दौरान श्योपुर एक महत्वपूर्ण टकसाल (मिंट) के रूप में भी कार्य करता था, जहाँ सिक्कों का निर्माण किया जाता था।
जब फिलोज़ राघोगढ़ के शासक जय सिंह के क्षेत्र पर अभियान चला रहा था, तब जय सिंह ने अवसर का लाभ उठाकर श्योपुर किले और फिलोज़ के परिवार को अपने कब्जे में ले लिया। 1818 के बाद फिलोज़ पुनः श्योपुर लौटा और इसे अपनी जागीर के रूप में संचालित करता रहा। ब्रिटिश काल और रियासती युग में श्योपुर ग्वालियर राज्य का हिस्सा बना रहा। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद यह भारत संघ में सम्मिलित हुआ। बाद में 1956 में राज्यों का पुनर्गठन 1956 के अंतर्गत ग्वालियर राज्य सहित अन्य क्षेत्रों का विलय मध्य प्रदेश में कर दिया गया। प्रशासनिक दृष्टि से वर्तमान श्योपुर जिला का गठन 1998 में मुरैना ज़िला से अलग करके किया गया था।