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काठमाण्डु: इतिहास

काठमाण्डु: इतिहास

काठमांडू के सबसे प्राचीन सभ्यता का ऐतिहासिक प्रमाण नही है, परन्तु इस के बारे में विभिन्न धार्मिक पुस्तक एवं वंशावलीयौं मे लिखा हुवा है। स्वयंभू पुराण अनुसार काठमांडू घाटी एक विशाल तालाब था। महाचीन के बोधिसत्त्व मंजुश्री ने इस तालाब के दक्षिणी भाग में अवस्थित कक्षपाल पर्वत और गुह्येश्वरी क्षेत्र में अपने चन्द्रह्रास खड्ग से प्रहार करके इस तालाब के पानी को निकाल दिया। भूगोलविद भी यह तथ्य मानते है कि काठमांडू पहले एक तालाब था। मंजुश्री ने धर्म रक्षित राज्य स्थापना करने के लिए एक मंजुपतन नगर का स्थापना किया (हाल के मजिपात टोल के स्थान में) और धर्माकर को इस नये राज्य का राजा बनाकर चीन लौटे।

गोपाल वंशावली अनुसार गोपाल वंश के लोग इस स्थान में भगवान श्रीकृष्ण के अनुयायी के रूप में गाय चराते हुए इस स्थान पर पहुंचे और यहा बस गए।

पुरातात्विक खुदाइ से मिले जानकारी अनुसार काठमांडू मध्य हिमाली क्षेत्र के प्राचीनतम बस्ती में से एक है। विभिन्न खुदाइ से १६७ इपू से लेकर १ इसं का ईंट काठमांडू और इस के आसपास के क्षेत्र में मिला है।

किरांतकाल के काठमांडू का ज्यादा निश्चित अवशेष उपलब्ध नहीं है।

लिच्छवि वंश के राजा गुणकाम देव के समय से पहले काठमांडू में (हाल के काठमांडू महानगरपालिका के कोर सिटी में) दक्षिण में दक्षिण कोलिग्राम (मंजुपत्तन/यंगाल) और उत्तर में यंबु /कोलिग्राम (गौ पालकौं का बस्ती) नामक दो अलग अलग बस्ती थे। यह दो बस्ती एक खड्ग आकार के उठा हुआ जमिन पर अवस्थित था जिस के तीन तरफ़ नदी या जल थे (विष्णुमती, बागमती और टुकुचा) और एक तरफ क्लिफ के निचे जंगल था। सामरिक दृष्टिकोण से यह जगह नगर बनाने के लिए उपयुक्त था। अतः गुणकामदेव नें इन दो बस्तीयौं के बीच में (दोनों बस्तीयौं को समायोजित करके) विष्णुमति नदी के किनारे कांतिपुर नगर स्थापना किया। यह नगर के चारो तरफ़ खडग आकार में अष्टमात्रिका वा अजिमायुक्त शक्तिपीठ (दुर्ग) का स्थापना किया, जो अभी भी शक्तिपीठौं के रूप में पुजित है। नेपाल के पहाडीयौं के बीच कांतिपुर जैसा सुरक्षित नगर के स्थापना से भारत और चीन-तिब्बत के बीच मे व्यापार सहज हो सकता था। अतः गुणकामदेव नें इस नगर में व्यापारिक सुविधा के हेतु चक्राकार में व्यापारिक क्षेत्र स्थापना किया।
ऐसा माना जाता है कि नेपाल सम्वत् के एक माह येँला (कान्तिपुर का माह) और उस माह के पुर्णिमा में मनाया जानेवाला येँया पुन्हि वा इन्द्र जात्रा कान्तिपुर के स्थापना के उपलक्ष्य पर गुणकामदेव नें मनाना शुरु किया था। इस माह में दक्षिण कोलिग्राम का लाखेजात्रा उत्तर में और कोलिग्राम का पुलुकिसि (ऐरावत) नृत्य दक्षिण में नचाया जाता है।

सन १२०० से सन १७६८ तक इस नगर में मल्ल राजाऔं का राज रहा। मल्लकाल में यह नगर नेपाली मल्ल गणराज्यौं मे से एक कांतिपुर राज्य का राजधानी रहा। इस काल में यह नगर में कला का बहुत विकास और विस्तार हुआ। यह नगर के ज्यादा मंदिर, चैत्य आदि इसी काल में निर्माण हुआ था। इस काल में इस नगर में धार्मिक सहिष्णुता, तंत्र विद्या, वास्तु, अर्थतंत्र आदि का विकास एवं विस्तार हुआ। इस काल में कांतिपुर लगायत के नेपाली मल्ल गणराज्य में रहने वाले विभिन्न नश्ल, धर्म, जाति आदि के लोगों नें एक संगठित राज्य का रूप लिया और इस राज्य में रहने वाले लोगों को नेपामि, नेवा वा नेपाली कहा गया।
सन १७६० के दशक में काठमांडू मे आए हुए क्रिस्चियन पादरी नें उस समय में काठमांडू में १८,००० होनेका ज़िक्र किया है। …

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Quelle: Text: Wikipedia – „काठमाण्डु“, Autorinnen und Autoren (Versionsgeschichte), CC BY-SA 4.0 · Foto: Superikonoskop, CC BY-SA 3.0 – Wikimedia Commons