अछाम जिला: इतिहास
अछाम जिले का इतिहास नेपाल के प्राचीन इतिहास से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। नेपाल के सुदूरपश्चिम विकास क्षेत्र के अंतर्गत सेती अंचल में स्थित यह पर्वतीय जिला ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। प्राचीन काल में वर्तमान अछाम को नौखुवा के नाम से जाना जाता था। नौखुवा का अर्थ नौ खण्डों वाला क्षेत्र माना जाता है। उस समय अछाम को नौ विभिन्न भागों में विभाजित कर छोटे-छोटे राज्यों के रूप में शासित किया जाता था। नेपाल के एकीकरण के समय अछाम बाइसी राज्यों के समूह का एक सदस्य राज्य था। कर्णाली प्रदेश में नागराजवंशी मल्ल शासकों के शासन से पूर्व अछाम पर पाल वंश का शासन था। बाद में मल्ल शासनकाल में यहाँ सभ्यता और संस्कृति का उल्लेखनीय विकास हुआ। तत्पश्चात मल्ल शक्ति के क्षीण होने पर कर्णाली और गण्डकी क्षेत्रों में अनेक छोटे राज्यों का उदय हुआ, जिनमें अछाम भी एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य के रूप में स्थापित हुआ। अछाम क्षेत्र को मध्यकाल में विकसित हुई खस सभ्यता के प्रमुख उद्गम-स्थलों में से एक माना जाता है।
राणा शासनकाल में अछाम का कैलाश नदी के पूर्व का भूभाग दैलेख जिला तथा पश्चिम का भूभाग डोटी जिला के अंतर्गत आता था। उस समय अछाम, डोटी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति का प्रमुख केंद्र था। विक्रम संवत् २०१४ में अछाम के दोनों भागों को मिलाकर डोटी जिले में सम्मिलित किया गया। बाद में विक्रम संवत् २०१८ के वैशाख १ गते (1 वैशाख 2018 वि.सं.) को नेपाल को 14 अंचलों और 75 जिलों में विभाजित किए जाने पर अछाम एक पृथक जिले के रूप में स्थापित हुआ। उस समय जिले को 39 ग्राम पंचायतों में विभाजित किया गया था, जबकि बाद में इसे 75 ग्राम विकास समितियों (गा.वि.स.) में विभाजित किया गया।
अछामी राजाओं का मूल निवास बड्ढी (बुढो) अछाम, अर्थात वर्तमान सेरा गा.वि.स. के कवालेख नामक स्थान में माना जाता है। इसके पश्चात राजधानी क्रमशः बान्नीगढ़ी, पुनः कवालेख तथा बाद में मंगलसैन स्थानांतरित हुई। मंगलसैन में निर्मित भव्य मंगलसेन दरबार वर्ष 2058 वि.सं. में हुए सशस्त्र संघर्ष के दौरान नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के आक्रमण में ध्वस्त हो गया और वर्तमान में उसके अवशेष भी लगभग समाप्त हो चुके हैं।
अछाम का इतिहास प्राचीन काल से ही संघर्षों और युद्धों से प्रभावित रहा है। यद्यपि विक्रम संवत् 1847 में नेपाल एकीकरण के दौरान अछाम राज्य विशाल नेपाल में सम्मिलित हो गया था, तथापि 1848 वि.सं. की चैते दशैं की रात्रि में देवचन्द्र शाह (द्वितीय) ने विद्रोह कर पुनः बान्नीगढ़ी पर अधिकार स्थापित किया और अछाम राज्य के अस्तित्व को बनाए रखा। इसके बाद मध्यकाल में भी अछाम को अनेक युद्धों का सामना करना पड़ा। इन्हीं संघर्षों की स्मृति से जुड़े जयगढ़ क्षेत्र में महामण्डलेश्वर यशोव्रह्म द्वारा उत्कीर्ण शिलालेख शांति और सद्भाव का संदेश देने वाले प्राचीन अभिलेखों में से एक माना जाता है। उस शिलालेख में निम्नलिखित पंक्तियाँ अंकित हैं—
ॐ मपिद्मे हुँ। महामण्डलेश्वर
बुद्ध कुलावतार यशोव्रहमचिरंजयतु।। श्री श्वादे १२७६।। …